विशाल विचार-शेखर सिद्दीकी ब्यूरो चीफ़ फतेहपुर
हरिओम मर गए, पर उनके सवाल अब भी जिंदा हैं। एक निर्दोष युवक को भीड़ ने शक के आधार पर पीट-पीटकर मार डाला, और प्रशासन मूकदर्शक बना रहा। यह केवल एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि समाज के उस हिस्से की संवेदना की मौत है, जो अन्याय देखकर भी चुप रहता है। राहुल गांधी की फतेहपुर यात्रा ने इस मामले में न केवल राजनीतिक हलचल पैदा की, बल्कि उस दबाव को भी उजागर किया जो पीड़ित परिवार पर लगातार बढ़ रहा है। हरिओम वाल्मीकि की मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या अब न्याय भीड़ तय करेगी? अगर शक के आधार पर किसी को मौत की सजा दी जाएगी, तो अदालतों, कानून और संविधान का क्या अर्थ रह जाएगा? यह घटना बताती है कि व्यवस्था तब असफल होती है जब इंसानियत मर जाती है और नफरत का शोर संवेदना की आवाज को दबा देता है।
पीड़ित परिवार ने बताया कि हरिओम को बिना किसी सबूत के मार दिया गया। उनका दोष सिर्फ इतना था कि वह “वो” था — एक आम दलित युवक, जो अपने हक की बात करता था। आज सवाल यह है कि क्या शक इंसानियत से बड़ा हो गया है? क्या हम ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहां भीड़ का फैसला ही कानून बन जाएगा? राहुल गांधी ने फतेहपुर पहुंचकर हरिओम के परिवार से मुलाकात की। उन्होंने कहा कि “यह केवल एक हत्या नहीं, यह सामाजिक अन्याय का प्रतीक है। जिस परिवार ने अपना बेटा खोया, आज वही परिवार घर में कैद है।” उनकी मुलाकात के दौरान परिवार ने बताया कि उन्हें धमकियां दी जा रही हैं, बाहर निकलने से रोका जा रहा है, और यहां तक कि बीमार बेटी का इलाज भी नहीं हो पा रहा।
यह दृश्य केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि उस लोकतंत्र का आईना है जिसमें “न्याय मांगना” भी अपराध माना जाने लगा है। राहुल गांधी की मौजूदगी में परिवार की पीड़ा और भी स्पष्ट होकर सामने आई — जहां हरिओम की चीख अब भी गूंजती है, और भीड़ की आवाज़ में दबे हुए न्याय की उम्मीद अब भी सांस ले रही है।
“हरिओम की चीख — ‘राहुल गांधी’, और भीड़ का जवाब — ‘हम बाबा के लोग हैं’” — यह संवाद केवल एक घटना नहीं, बल्कि उस राजनीतिक कट्टरता की भयावह तस्वीर है जिसने समाज को दो हिस्सों में बाँट दिया है। सवाल यह है कि क्या अब इंसानियत की कोई कीमत बाकी रह गई है?हरिओम की हत्या मानवता की हत्या है। यह हमें सोचने पर मजबूर करती है कि कब तक जाति, धर्म और शक इंसानियत से बड़े रहेंगे। अगर भीड़ का डंडा कानून से पहले चलेगा, तो कोई भी सुरक्षित नहीं — आज हरिओम है, कल कोई और होगा।
अब समय है सवाल पूछने का — इंसानियत से बड़ा क्या है, शक या सत्ता?
