विशाल विचार डेस्क |सत्यम तिवारी
कानपुर
अप्रैल 2025 में रावतपुर थाने से ककवन थाने के लिए ट्रांसफर किए गए सिपाही अजीत सोलंकी (P.No. 182419821) आज अगस्त शुरू हो जाने के बाद भी अपनी पुरानी तैनाती पर ही मौजूद हैं। सवाल यह नहीं है कि उन्होंने स्थानांतरण के आदेश का पालन क्यों नहीं किया — सवाल यह है कि उनके ऊपर कार्रवाई क्यों नहीं हुई, जबकि पूरा सिस्टम इस बात से वाकिफ है।चार महीने से जारी ‘अदृश्य संरक्षण’? सिर्फ ट्रांसफर ऑर्डर की कॉपी सार्वजनिक की गयी, बल्कि संबंधित थाना प्रभारी, DCP वेस्ट और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को इस विषय में व्यक्तिगत रूप से सूचित भी किया गया। सोशल मीडिया के माध्यम से भी कई प्रयास किए गए, लेकिन अब तक न तो कोई बयान आया है, न ही कोई कार्रवाई।यह सिर्फ एक सिपाही का मामला नहीं है…यह सवाल अब सिर्फ एक सिपाही के ड्यूटी लोकेशन का नहीं रह गया है। यह मामला सीधे उस प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है जिसमें नियमों की जगह “मैनेजमेंट” की ताकत चलती दिख रही है।क्या ट्रांसफर केवल फॉर्मेलिटी बनकर रह गए हैं?क्या कुछ पुलिसकर्मी अपनी पसंद की पोस्टिंग बनाए रखने के लिए सिस्टम को अपने मुताबिक चलवा सकते हैं?क्या अधिकारियों की चुप्पी, किसी अंदरूनी सांठगांठ की ओर इशारा नहीं करती?क्यों चुप हैं जिम्मेदार?जब जनता के किसी ट्रांसफर सर्टिफिकेट में छोटी सी गलती हो जाए, तो दफ्तर दौड़ पड़ते हैं। लेकिन एक वर्दीधारी सिपाही चार महीने से अपने ट्रांसफर को नजरअंदाज कर रहा है — और प्रशासन अब तक चुप है।क्या होनी चाहिए कार्रवाई?इस प्रकरण की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। ट्रांसफर ऑर्डर के अनुपालन में देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों से जवाबदेही तय होनी चाहिए और ऐसे उदाहरणों को नजीर बनाया जाना चाहिए ताकि भविष्य में कोई सिस्टम को हल्के में न ले।—विशाल विचार कहता है:यदि कानून के रक्षक ही नियमों की अनदेखी करेंगे, और प्रशासन चुप रहेगा — तो जनता किससे न्याय की उम्मीद करे?
