प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत करोड़ों रुपये की लागत से गांव-गांव तक मजबूत सड़कें बनाने का दावा किया जाता है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि रसूखदार मोरम माफियाओं की मनमानी ने इस योजना की साख पर बट्टा लगा दिया है।असोथर नगर पंचायत क्षेत्र का कठौता मार्ग कुछ ही महीनों पहले प्रधानमंत्री सड़क योजना से बना था। लेकिन जुलाई माह से जैसे ही मोरम डंप चालू हुए, इस मार्ग पर ओवरलोड डंपर और ट्रेलरों का संचालन तेज हो गया। ग्रामीणों का कहना है कि इन डंपरों में 70–80 टन तक मोरम लादकर धड़ल्ले से आवाजाही होती है। नतीजा यह हुआ कि चंद हफ्तों में ही सड़क जगह-जगह से उखड़ गई और गहरे गड्ढों में तब्दील हो गई। अब यह सड़क राहगीरों और बाइक सवारों के लिए जानलेवा साबित हो रही है।
ग्रामीणों ने बताया कि बारिश के दौरान सड़क पर बने गड्ढों में पानी भर जाने से स्थिति और भयावह हो गई है। कई अभिभावकों ने अपने बच्चों को सड़क की खतरनाक हालत के चलते स्कूल भेजना बंद कर दिया है। इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई और भविष्य पर पड़ रहा है।
वहीं अखिल भारतीय मौर्य महासभा फतेहपुर, नवयुवक जय मां दुर्गे समिति और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के पदाधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि ओवरलोडिंग पर रोक नहीं लगी और सड़क को जल्द दुरुस्त नहीं किया गया तो वे बड़ा आंदोलन करेंगे। उनका कहना है कि सड़क पर बच्चों की शिक्षा और ग्रामीणों की जान दोनों दांव पर लगी हैं, लेकिन प्रशासन खामोश बना हुआ है।
ग्रामीणों ने खुलकर आरोप लगाया कि खनिज, परिवहन और पुलिस विभाग की मिलीभगत से ही मोरम माफियाओं का खेल चल रहा है। आरोप है कि स्थानीय पुलिस, जिला प्रशासन से लेकर राजधानी तक इनकी पकड़ इतनी मजबूत है कि विभागीय अधिकारी केवल खानापूर्ति तक ही सीमित रहते हैं।
ग्रामीणों ने सवाल उठाया है कि आखिर करोड़ों की लागत से बनी प्रधानमंत्री सड़क योजना की सड़कें क्या यूं ही माफियाओं के हाथों तबाह होती रहेंगी? क्या शासन-प्रशासन समय रहते ठोस कार्रवाई करेगा? और क्या स्कूली बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो पाएगा? आखिरकार आगे अब यह देखना है कि प्रशासन पर बैठे अधिकारी माफियाओं पर क्या शिकंजा कसेंगे या फिर ऐसे ही माफियाओं के हौसले बुलंद होते रहेंगे?

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