विशाल विचार- शेखर सिद्दीकी, ब्यूरो चीफ फतेहपुर
करवाचौथ 2025: आस्था, प्रेम और परंपरा का अद्भुत संगम
जिलेभर में शुक्रवार को करवाचौथ का पावन पर्व आस्था, प्रेम और समर्पण के रंगों में डूबकर मनाया गया। सुहागिनों ने सूर्योदय से पहले ही निर्जला व्रत का संकल्प लिया और पूरे दिन बिना जल एवं भोजन ग्रहण किए अपने पति की लंबी आयु और सुखमय दांपत्य जीवन की कामना की।
सुबह से ही तैयारियों का उत्साह हर घर में दिखाई दिया। शाम होते ही लाल साड़ियों में सजी महिलाओं ने सोलह श्रृंगार के साथ मेंहदी से सजे हाथों में पूजा की थालियाँ सजाईं। घर-घर में पारंपरिक करवा रखे गए और देवी-देवताओं की विधिवत पूजा-अर्चना की गई।

चाँद के दीदार के साथ पूर्ण हुआ व्रत
चाँद निकलते ही सुहागिनों की आँखों में खुशी और श्रद्धा झलक उठी। महिलाओं ने छलनी से चाँद का दर्शन कर अर्घ्य अर्पित किया, इसके बाद पति के मुख को देखकर व्रत खोला। यह क्षण हर दंपत्ति के लिए प्रेम, विश्वास और समर्पण का प्रतीक बन गया।
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में दिखी रौनक
अमौली, बिंदकी, जहानाबाद, खजुहा सहित ग्रामीण इलाकों और नगर में करवाचौथ की छटा देखते ही बन रही थी। मंदिरों में भक्तिमय वातावरण छाया रहा। महिलाओं ने एक-दूसरे के साथ कथा सुनी, मंगल गीत गाए और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पर्व को हँसी-खुशी मनाया।
बुजुर्ग महिलाओं ने नई पीढ़ी को करवाचौथ के सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व से परिचित कराया, जिससे परंपरा को नई ऊर्जा मिली।

पतियों की सहयोगी भूमिका ने बढ़ाया पर्व का महत्व
पतियों ने भी प्रेम और सम्मान के साथ इस पवित्र पर्व में भागीदारी निभाई। किसी ने उपहार देकर आभार व्यक्त किया, तो किसी ने पत्नी के साथ बैठकर व्रत खोलने का भावनात्मक क्षण साझा किया। इससे पारिवारिक रिश्तों में और मजबूती देखने को मिली।
करवाचौथ का संदेश
करवाचौथ ने एक बार फिर यह साबित किया कि भारतीय नारी केवल अपने श्रृंगार से नहीं, बल्कि त्याग, प्रेम और अटूट विश्वास से सतीत्व और संस्कार की परंपरा को जीवित रखती है। यह पर्व दांपत्य जीवन के पवित्र बंधन, निष्ठा और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक है।

