एक कार्यक्रम में मौके के अनुरूप भारतीय विदेश मंत्री ने चीन को आड़े हाथों लिया तथा अप्रत्यक्ष रूप से हमला बोलते हुए कहा कि जब राष्ट्रों द्वारा कानूनी दायित्वों व लम्बे समय से चले आ रहे समझौतों का उल्लंघन किया जाता है तो भरोसा टूट जाता है। बांग्लादेश की राजधानी ढाका में आयोजित किए गए हिंद महासागर सम्मेलन के छठे संस्करण में बोलते हुए विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा कि हिंद महासागर क्षेत्र में पनपी अव्यवस्था , अव्यवहार्य परियोजनाओं के कारण उत्पन्न हुई है। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य के सही तरीके से चलने के लिए कानूनों के पालन व नियमों के सम्मान को एक प्राकृतिक पहलू करार दिया। विदेश मंत्री ने चीन के द्वारा हमेशा किए जाने वाले सीमा उल्लंघन को आधार बनाकर विदेश मंत्री ने कहा कि “जब राष्ट्र कानून के दायित्वों का उल्लंघन व वैश्विक समझौतों की अवहेलना करते हैं , जैसा कि हम देखते हैं तो भरोसे को ठेस पहुँचती है। इसलिए स्वहित आधारित दृष्टिकोण अपनाने की बजाय दीर्घकालिक सभी के लाभ वाले दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है।” भारत लगातार पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन की विस्तारवादी नीतियों के खिलाफ रहा है और उसके आक्रामक कदमों को आलोचित करता रहा है। चीन लगातार सीमा संबंधी समझौतों का उल्लंघन करता आया है।

जयशंकर ने संबोधन को आगे बढ़ाते हुए कहा कि “करीब पिछले दो दशकों से हो रही गतिविधियाँ सबक हैं , जिन्हें हम अपने ऊपर जोखिम लेकर अनदेखा करते आये हैं। अगर हम चीन की नीति के अनुसार अपारदर्शी ऋण व महँगी परियोजनाओं की योजना को आगे बढ़ाते रहे तो बाद में हमें ही इसका नुकसान उठाना पड़ेगा।” सधे हुए वैश्विक संपर्क के लिए जयशंकर ने कहा कि हमें अपनी अखंडता व सम्प्रभुता को महत्व देने की जरूरत है तथा सामने वाले देश के इन दोनों पहलुओं का सम्मान करना होगा। भारत लगातार चीन की 60 अरब डॉलर की महत्वाकांक्षी परियोजना “चीन – पाकिस्तान आर्थिक गलियारा” का विरोध करता रहा है। इसका मार्ग पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से गुजरता है जो भारत का क्षेत्र है। चीन इसके माध्यम से बलूचिस्तान होते हुए ग्वादर बंदरगाह का प्रयोग करेगा तथा अरब सागर तक पहुँच बनायेगा।

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